समझें क्या है पूरा मामला
- कोटा में 5 प्रसूताओं की मौत के लिए अस्पतालों की लापरवाही को जिम्मेदार माना।
- जांच के लिए गठित पैनल ने अपनी रिपोर्ट में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन को दी क्लीनचिट।
- जांच रिपोर्ट में कहा कि ऑक्सीटोसिन की अनुपस्थिति मौत के लिए जिम्मेदार नहीं।
- रिपोर्ट के अनुसार उच्च जोखिम वाली गर्भधारण के प्रबंधन में प्रक्रियात्मक कमियां पाई गईं।
Kota: राजस्थान के कोटा में प्रसूताओं की मौत के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। जांच में अस्पतालों की गंभीर लापरवाही को जिम्मेदार माना गया है।
इस मामले की जांच के लिए 8 सदस्यों की एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी में एम्स (AIIMS) के डॉक्टर भी शामिल थे।
जांच रिपोर्ट में माना गया कि महिलाओं की मौत की वजह ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन नहीं था। जांच में उच्च जोखिम वाली गर्भधारण के प्रबंधन में प्रक्रियात्मक कमियों को जिम्मेदार ठहराया गया है।
पहले था दवा पर शक
कुछ समय पहले कोटा के जेके लोन अस्पताल और न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पांच प्रसूताओं की मौत हुई थी। इसके बाद बीकानेर और जोधपुर में भी ऐसे मामले आए।
शुरुआत में शक जताया गया था कि डिलीवरी के समय दिया जाने वाला ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन खराब था। इसके बाद सरकार ने इंजेक्शन की जांच कराई।
जांच में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन फेल था। यानी उसमें दवा के आवश्यक कंटेट नहीं थे। इसके बाद इस इंजेक्शन की सप्लाई पर बैन लगा दिया था। और संबंधित कंपनी का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था। एक्सपर्ट कमेटी ने कहा है कि मौतों के लिए दवा जिम्मेदार नहीं थी।
मौत के कई कारण गिनाए
जांच पैनल ने हाल ही में सौंपी अपनी रिपोर्ट में मौतों के लिए कई कारण गिनाए। रिपोर्ट के अनुसार लगभग सभी मामलों में क्लिनिकल लक्षण अलग-अलग पाया गया हैं। किसी भी मौत के लिए दवाओं को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है।
समिति का मानना है कि सक्रिय फार्मास्युटिकल घटक (API) ऑक्सीटोसिन की अनुपस्थिति को मृत्यु दर के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।
जांच में सामने आईं ये बड़ी लापरवाहियां
इन्फेक्शन कंट्रोल फेल
जांच रिपोर्ट में सबसे बड़ी कमी इन्फेक्शन को रोकने में पाई गई। अस्पतालों में संक्रमण से बचने के नियमों का ठीक से पालन नहीं हो रहा था। इस वजह से मरीजों में इन्फेक्शन फैलने का खतरा बढ़ गया।
गंभीर मरीजों की खराब मॉनिटरिंग
जो महिलाएं हाई-रिस्क प्रेगनेंसी (गंभीर स्थिति) में थीं, उन पर कोई खास नजर नहीं रखी गई। ऑपरेशन के बाद भी मरीजों की देखभाल में बड़ी ढिलाई बरती गई।
कागजी कार्रवाई में खानापूर्ति
अस्पतालों में मरीजों का रिकॉर्ड बहुत खराब था। मरीजों की केस हिस्ट्री, ब्लड प्रेशर और पल्स रेट जैसी जरूरी चीजें ठीक से दर्ज नहीं की गई थीं। ऐसा लग रहा था कि रूटीन चेकअप किए बिना ही सिर्फ कागजों पर उसे सही मान लिया गया।
छपे-छपाए पर्चों का इस्तेमाल
अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा पहले से छपे हुए (Pre-printed) क्लिनिकल नोट्स इस्तेमाल किए जा रहे थे। हर मरीज की बीमारी अलग होती है, लेकिन यहां सबके लिए एक ही जैसा तरीका अपनाया जा रहा था। इसके अलावा इलाज से पहले मरीज और उनके परिवार को खतरों के बारे में सही से नहीं बताया जा रहा था।
खून और दवाओं के रख-रखाव में कमी
अस्पतालों में जीवन रक्षक दवाओं और ब्लड प्रोडक्ट्स को स्टोर करने का कोई सही नियम नहीं था। किस मरीज को कौन सी दवा कितनी मात्रा में दी जा रही है, इसका कोई पुख्ता रिकॉर्ड नहीं था।
सभी महिलाओं की मौत के कारण अलग थे
जांच में पता चला कि मरने वाली सभी महिलाओं की मेडिकल स्थिति अलग थी। किसी एक वजह से सबकी मौत नहीं हुई। जेके लोन हॉस्पिटल में एक महिला की मौत पहले से मौजूद दिल की बीमारी के कारण हुई। दूसरी महिला की मौत डिलीवरी के बाद बहुत ज्यादा खून बहने से हुई।
वहीं न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में एक महिला की मौत फेफड़ों में खून का थक्का जमने से हुई। एक अन्य महिला की मौत किडनी फेल होने के कारण हुई थी।
तीन शहरों में आए मामले सामने
मई में कोटा में सिजेरियन ऑपरेशन डिलीवरी के बाद 5 महिलाओं की मौत हो गई थी। सात अन्य महिलाओं की तबीयत गंभीर हो गई। इनमें से कुछ को किडनी फेल होने के बाद डायलिसिस पर रहना पड़ा।
बीकानेर के पीबीएम हॉस्पिटल में जून में दो और प्रसूताओं की मौतें हुईं। छह महिलाओं की किडनी फेल हो गई थी।
जून में ही जोधपुर के जिला पावटा अस्पताल में सिजेरियन कराने के बाद दो महिलाओं की तबीयत बिगड़ गई। अधिकारियों ने इन मौतों के बीच किसी भी संबंध से इनकार किया है।
अस्पताल में आते हैं गंभीर केस
एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोटा के दोनों बड़े अस्पतालों में पूरे संभाग से सबसे गंभीर केस आते हैं। ऐसे में अस्पतालों को अधिक सतर्कता बरतने की जरूरत होती है।
रिपोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि अगर अस्पताल प्रशासन सजग रहता तो कई महिलाओं की जान बचाई जा सकती थी। कमेटी ने अब अस्पतालों को अपने नियमों में तुरंत सुधार करने के लिए सुधार लाने को कहा है।
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