समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश में मेडिकल ऑफिसर भर्ती-2024 की पदस्थापना विवादों में घिर गई है।
- 11 जून को पोस्टिंग आदेश जारी हुए थे।
- इसके बाद से प्रदेशभर में डॉक्टर्स विरोध जता रहे हैं।
- कई डॉक्टरों ने अब तक जॉइन नहीं किया है।
- कुछ डॉक्टर हाई कोर्ट भी पहुंच गए हैं।
चॉइस फिलिंग पर उठे सवाल
डॉक्टरों का आरोप है कि 10 जून को रिजल्ट आने के बाद स्वास्थ्य संचालनालय मध्य प्रदेश ने 35 अभ्यर्थियों को बुलाया था। इन्हें उनकी पसंद के अस्पताल भरने का मौका भी दिया गया।
इसके बाद 25 जून को अचानक नए आदेश जारी हुए। कोई सार्वजनिक सूचना नहीं दी गई। नई पदस्थापना सूची जारी कर दी गई।
अभ्यर्थियों का कहना है कि इससे मेरिट का पूरा नियम टूट गया। कई ऊंची रैंक वाले डॉक्टरों को उनकी पहली या दूसरी पसंद नहीं मिली। वहीं सैकड़ों रैंक नीचे के डॉक्टरों को वही अस्पताल दे दिए गए, जो ऊंची रैंक वालों ने मांगे थे।
पोर्टल में भी मिलीं खामियां
आरोप है कि चॉइस फिलिंग के दौरान भोपाल, इंदौर समेत कई जिलों के अस्पताल पोर्टल पर दिखे ही नहीं। खाली पदों की सूची 2019 के बाद अपडेट नहीं हुई थी। कई नई संस्थाएं पोर्टल से पूरी तरह गायब रहीं। इससे डॉक्टरों के पास सही विकल्प चुनने का मौका ही नहीं बचा।
रैंक 98 का उदाहरण
जानकारी के अनुसार रैंक-98 वाले एक डॉक्टर को ईसागढ़ सीएचसी दी गई। यह उनकी सातवीं पसंद थी। उनकी पहली पसंद उनाव पीएचसी (दतिया – Datia) थी। यह रैंक-183 वाले अभ्यर्थी को मिली।
दूसरी पसंद गोंदन पीएचसी (दतिया) थी। यह रैंक-298 वाले को आवंटित हुई। तीसरी पसंद पीथमपुर (धार – Dhar) रैंक-735 वाले को मिली। चौथी पसंद सैलाना (रतलाम – Ratlam) रैंक-180 वाले अभ्यर्थी के हिस्से आई।
रैंक 83 का भी यही हाल
रैंक-83 वाले एक डॉक्टर की पहली पसंद वाला केंद्र रैंक-1108 के अभ्यर्थी को दे दिया गया। यह उदाहरण मेरिट क्रम पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है। डॉक्टरों ने इसे लेकर स्वास्थ्य विभाग को पत्र भी लिखा है।
सरकार का पक्ष
स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव आईएएस अशोक बर्णवाल ने इस पर सफाई दी है। उनका कहना है कि चॉइस फिलिंग सिर्फ डॉक्टरों की सुविधा के लिए थी। यह कोई प्रशासनिक अधिकार नहीं है।
उन्होंने बताया कि सरकार का मकसद दूरदराज इलाकों में डॉक्टरों की उपलब्धता तय करना है। उनके अनुसार 1175 चयनित डॉक्टरों में से सिर्फ 3-4 ने जॉइन नहीं किया है।
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