छत्तीसगढ़ के जंगलों में रहने वाली आदिवासी महिलाओं की आजीविका का बड़ा आधार लघु वनोपज है। हर दिन सुबह से शाम तक जंगलों में भटककर वे महुआ, इमली, हर्रा, बहेड़ा, गिलोय, शतावरी, सफेद मूसली, पत्तल और दूसरी वन उपज इकट्ठा करती हैं। लेकिन उनकी इस कड़ी मेहनत का सबसे बड़ा फायदा बिचौलियों को मिल रहा है।
बाजार तक सीधी पहुंच, परिवहन की सुविधा और सरकारी खरीदी व्यवस्था की कमी के कारण महिलाएं अपनी उपज बेहद कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं। वन गांवों में रहने वाली महिलाओं की यही कहानी है। उनका पूरा मुनाफा बिचौलियों की जेब में जा रहा है।
औने पौने दाम में खरीदते हैं जड़ी बूटी :
वन गांवों में रहने वाली महिलाओं की कहानी इस व्यवस्था की हकीकत बयां करती है। महिलाएं कहती हैं कि वे रोज सुबह जंगल जाती हैं और घंटों मेहनत के बाद एक महिला करीब पांच किलो औषधीय जड़ी-बूटियां इकट्ठा करती हैं।
पूरे दिन की इस मेहनत के बदले उन्हें मुश्किल से 40 से 50 रूपए मिलते हैं। उनका कहना है कि शहरों के बाजारों में यही जड़ी-बूटियां कई गुना अधिक कीमत पर बिकती हैं, लेकिन गांव से बाजार की दूरी और आने-जाने के साधनों की कमी के कारण वे सीधे खरीदार तक नहीं पहुंच पातीं।
क्षेत्र की महिलाएं बताती हैं कि वे जंगलों से गिलोय, कालमेघ, सफेद मूसली, शतावरी, हर्रा और बहेड़ा जैसी औषधीय वन उपज भी संग्रहित करती हैं। इनमें से कई उत्पाद आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल होते हैं और बाजार में इनकी अच्छी कीमत मिलती है। इसके बावजूद गांवों में सक्रिय बिचौलिए इन्हें बेहद कम दाम पर खरीद लेते हैं।
मजबूरी में महिलाएं सौदा करने के लिए तैयार हो जाती हैं, क्योंकि उनके पास सामान को लंबे समय तक सुरक्षित रखने या दूर के बाजार तक ले जाने की सुविधा नहीं होती।
शहरों में ऊंची कीमत पर बिकती है वन उपज :
आदिवासी महिलाएं (Tribal women) कहती हैं कि दोना पत्तल तैयार करने में कई दिनों की मेहनत लगती है। पत्ते तोड़ने, उन्हें सुखाने और सिलाई करने के बाद तैयार पत्तलों के बदले उन्हें 500 से 700 रूपए ही मिलते हैं। वहीं बिचौलिए यही पत्तल शहरों में कई गुना अधिक कीमत पर बेच देते हैं।
महिलाओं का कहना है कि यदि उन्हें उचित बाजार और खरीदार मिल जाएं तो उनकी आय दोगुनी-तिगुनी हो सकती है। ग्राम वन प्रबंधन समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि अधिकांश आदिवासी परिवार कम मात्रा में वन उपज इकट्ठा करते हैं।
इतनी कम मात्रा लेकर 30 से 40 किलोमीटर दूर बाजार जाना उनके लिए घाटे का सौदा साबित होता है। कई बार वे सड़क किनारे घंटों बैठकर खरीदार का इंतजार करते हैं, लेकिन ग्राहक नहीं मिलने पर अंततः बिचौलियों को ही सामान बेचना पड़ता है।
बिना काम के खरीदी केंद्र :
ग्रामीणों का कहना है कि गांवों में लघु वनोपज खरीदी केंद्र तो बनाए गए हैं, लेकिन वे नियमित रूप से संचालित नहीं होते। कई बार लोगों को यह जानकारी ही नहीं मिलती कि खरीदी कब शुरू होगी और कब बंद हो जाएगी।
ऐसी स्थिति में उनके पास बिचौलियों को सामान बेचने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता। आंकड़े भी इस समस्या की गंभीरता को दिखाते हैं। राज्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर लघु वनोपज की सरकारी खरीदी पिछले कुछ वर्षों में काफी कम हुई है।
वर्ष 2021 में जहां 6.27 लाख क्विंटल से अधिक लघु वनोपज की खरीदी हुई थी, वहीं 2024-25 में यह घटकर लगभग 35 हजार क्विंटल रह गई। सरकारी खरीदी घटने का सीधा असर वन उपज संग्राहकों, खासकर महिलाओं की आय पर पड़ा है और उनकी निर्भरता बिचौलियों पर बढ़ी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वन उपज खरीदी केंद्र नियमित रूप से संचालित किए जाएं, गांव स्तर पर भंडारण और परिवहन की बेहतर व्यवस्था हो और महिलाओं को सीधे बाजार और प्रसंस्करण इकाइयों से जोड़ा जाए, तो उनकी आमदनी में बड़ा सुधार हो सकता है।
फिलहाल स्थिति यह है कि जंगलों में सबसे अधिक मेहनत आदिवासी महिलाएं कर रही हैं, लेकिन उनकी मेहनत का सबसे बड़ा मुनाफा बिचौलियों की जेब में जा रहा है।
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